The Gods of Kulu (1909)

An ethnographic account, documenting the religious beliefs, rituals, and cultural practices of the people living in the Kulu region, particularly around the Kulu town, during the early 20th century. It explores various deities worshipped in the region, such as Sibji (Bijli Mahdeu), Jamlu, and Narsingh Bir, shedding light on their origins, significance, and the rituals associated with them. Additionally, it discusses the cultural context of Kulu at the time, highlighting the practicality and self-respect of its inhabitants despite their deeply rooted religious beliefs.

Colin Rosser and the ‘hermit’ village of Malana: a lost classic of village studies ethnography

Of the first wave of village studies ethnographers, it was Colin Rosser who chose what was—physically and psychologically—perhaps the most challenging location to undertake fieldwork.  After graduating from the Faculty of Archaeology and Anthropology at Cambridge, Rosser joined the newly created Dept of Cultural Anthropology at SOAS in 1950 to study for a PhD under the supervision of Professor Christoph von Fürer-Haimendorf. Perhaps because he had served as a Gurkha officer in India in the Second World War, Rosser favoured the Himalayas as his PhD field site and he remained attached to the region for the rest of his working life.

कुल्लू क्षेत्र का राखस-खेल (लोकनाट्य)

यह लेख मौलू राम ठाकुर द्वारा लिखित पुस्तक ‛हिमाचल प्रदेश के लोकनाट्य और लोकानुरंजन’ (1981) तथा विपाशा पत्रिका (अंक 33-34, 1990) में छपे उनके लेख ‛कुल्लू क्षेत्र की लोक नाट्य परम्परा’ को एकीकृत कर तैयार किया गया है। हिमाचल प्रदेश के अनेक भागों में पौष और माघ महीनों को ‛काला Read more…

कुल्लू का मोहक लोक-नृत्य: नाटी | सोमसी आलेख (1976)

हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की त्रैमासिक शोध पत्रिका सोमसी के वर्ष 2 अंक 3 (जुलाई 1976) में छपा पुरोहित चन्द्रशेखर ‘बेबस’ जी का एक लेख। महाभारत में किसी ‘उत्सव क्षेत्र’ का उल्लेख मिलता है। वह ठहरता तो हर हाल में हिमाचल प्रदेश में ही है पर कुछ विद्वानों Read more…

कुल्लू के घटना और श्रमप्रधान गीत

“सम्पूर्ण पुस्तक यहाँ पढ़ें” घेशू लोभीया यह गीत एक दुखद घटना पर आधारित है। कुल्लू के कुछ लोग पुरुष, स्त्री चंबा में जंगलात के ठेकेदार के साथ काम पर गए थे। उनमें घेशू और उनकी पत्नी भी थी। सुंदर नाम का एक युवक घेशू की पत्नी पर आशिक हो गया। Read more…

पहाड़ी में रचित साहित्य यात्रा और मूल्यांकन | हिमप्रस्थ आलेख (2020)

सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश की मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ, वर्ष 2019-20 के संयुक्तांक 11-12 (फरवरी-मार्च, 2020) में छपा सुदर्शन वशिष्ठ जी द्वारा लिखित एक आलेख। यूं तो किसी भी भाषा का निर्माण सदियों से चली आ रही परंपरा और संस्कारों से होता है। समय के अनंतर उसके साहित्य का Read more…

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